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H.H. Pujya Swami Chidanand Saraswatiji | | Homage to Kedarnath Disaster & Uttarakhand Floods 2013
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Homage to Kedarnath Disaster & Uttarakhand Floods 2013

Jun 17 2020

Homage to Kedarnath Disaster & Uttarakhand Floods 2013

On the 7th Anniversary of the Kedarnath disaster (16 and 17 June 2013) we remember how nature wreaked such havoc in Uttarakhand. The damage increased many fold due to man-made unsustainable development and as a result countless lives gone to soon. Pujya Swamiji and Sadhvi Bhagawatiji paid homage to the departed souls and reminded us again to learn the lesson from Mother Nature and to lead lives in harmony with her.

Pujya Swami Chidanand Saraswatiji said, “Natural disasters cannot be prevented, but human mistakes can be improved and minimized. In the era of modernization, the concept of green culture has to be born to remove the growing imbalance between nature and culture and establish harmony. We need to move from a greed culture to a green culture, constructing green buildings, creating green pilgrimage and pledging to live green lifestyles. At the same time, energy efficiency, water efficiency and appropriate waste disposal systems need to be a priority, only by this we can balance economic development with ecological preservation.”

Watch Pujya Swamiji’s thought provoking video message:

केदारनाथ आपदा की सातवी बरसी है परन्तु उस मंजर के बारे में सोचकर ही दिल दहल जाता है। 16 व 17 जून 2013 को प्रकृति ने ऐसा कहर बरपाया उसमें अनेक जिन्दगियां तबाह हो गयी। प्राकृतिक आपदाओं को रोका तो नहीं जा सकता परन्तु मानवीय भूलों में सुधार कर कम जरूर किया जा सकता है।

केदारनाथ आपदा की 7 वीं बरसी पर परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने दिवंगत आत्माओं को श्रद्धाजंलि अर्पित करते हुये कहा कि यह प्रकृति का आस्था पर प्रहार था। प्रकृति के साथ यदि छेड़छाड़ की जाये ंतो वह अपना रौद्र रूप दिखा सकती है, केदारनाथ आपदा उसी का एक उदाहरण है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि वर्तमान समय में वैज्ञानिक युग में प्रकृति व संस्कृति के मानवीय सहचर्य व सोच के मध्य दूरी बढ़ती जा रही है। इस समय वैज्ञानिक विकास को ही विकास का प्रतीक मान लिया गया है तथा प्रकृति व संस्कृति के विपरीत कार्य किया जा रहा है। वैज्ञानिक विकास व उससे होने वाली प्रगति जरूरी है लेकिन पारंपरिक संस्कार व प्रकृति के साथ सामंजस्य उससे भी ज्यादा जरूरी है। जिस प्रकार प्रकृति के विरूद्ध विकास किया जा रहा है, उससे मानव अस्तित्व के लिये बड़ी समस्या उत्पन्न हो सकती है। वर्ष 2013 में आयी केदारनाथ आपदा उसी का परिणाम है। मनुष्य ने प्रकृति व प्राचीन संस्कृति के संयोजन के स्थान पर अंधाधुंध विकास को प्राथमिकता दी है।

Pujya Swamiji’s divine green example

प्राचीन काल से ही मानव ने अपने पारंपरिक संस्कारों के माध्यम से प्रकृति के संरक्षण की संस्कृति के साथ विकास को समृद्ध किया है। मनुष्य ने अपनी कई वर्षो की विकास यात्रा के दौरान प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर विकास किया और उसके परिणाम भी सुखद रहे। हमारे ऋषियों ने भी प्रकृति के साथ साहचर्य स्थापित कर ही जीवन जिया। लेकिन वर्तमान में मनुष्य ने भौतिकवादी परिवेश में अपने पारंपरिक संस्कारों को पीछे छोड़ते हुए, प्राकृतिक परिवेश में कंक्रीट के जंगलों को खड़ा कर दिया है। सीमेंट व लोहे से बने घर आज हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग बन गये है। अवैज्ञानिक विकास की इस अंधाधुंध दौड़ ने अनेक बार प्राकृतिक आपदाओं को जन्म दिया है। जब उत्तराखंड में केदारनाथ त्रासदी ने अपना कहर बरपाया था उस समय सीमेंट व कंक्रीट के जंगल देखते-ही-देखते धराशायी हो गए तथा प्रकृति-संस्कृति का गठजोड़ बना रहा और हमारे हरे भरे जंगल आज भी खड़े हैं और हम सभी को जीवनदायिनी आॅक्सीजन प्रदान कर रहे हंै।

आधुनिकीकरण के युग में प्रकृति व संस्कृति के मध्य बढ़ते असंतुलन को दूर करने तथा सामंजस्य की स्थापना करने हेतु हरित संस्कृति की अवधारणा को जन्म देना होगा। हरित भवनों का निर्माण करना होगा ये ऐसे भवन होते हैं जो आपदा संभावित क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किये जाते हैं। साथ ही ऊर्जा सक्षमता, जल सक्षमता तथा अपशिष्ट निपटान प्रणाली से युक्त होते हैं, इसके द्वारा ही हम पर्यावरण संरक्षण तथा प्रकृति के साथ संतुलन बना सकते हंै।

हमें प्रकृति व संस्कृति के बेहतर सामंजस्य के लिये पारंपरिक व आधुनिक संस्कारों के मध्य संतुलन स्थापित करना होगा। हम सभी आज संकल्प लें कि प्रकृतिमय जीवनयापन करंेगे और प्रकृति के साथ संतुलन बनाये रखेंगे।

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